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कहाँ रहती हैं माँ लक्ष्मी, और कहाँ निवास करती हैं अलक्ष्मी?

लोग अक्सर कहते हैं, “घर में लक्ष्मी का आगमन हो गया” या “अलक्ष्मी का प्रभाव है।” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है, आख़िर लक्ष्मी और अलक्ष्मी में अंतर क्या है? यह रहस्य पद्म पुराण और लक्ष्मी तंत्र जैसे वैदिक ग्रंथों में विस्तार से बताया गया है।

जब समृद्धि नहीं, दरिद्रता आती है

पुराणों के अनुसार, लक्ष्मी और अलक्ष्मी — दोनों एक ही शक्ति के दो विरोधी रूप हैं। जिस प्रकार ज्योति के बिना अंधकार अधूरा रहता है, उसी प्रकार माँ लक्ष्मी के बिना “अलक्ष्मी” का कोई अर्थ नहीं।

कहा गया है कि जहाँ झूठ, छल, कलह, और अपवित्रता का वास होता है, वहाँ अलक्ष्मी अपना घर बनाती हैं। वह दरिद्रता, असंतोष और विघटन की प्रतीक हैं। ऐसे स्थानों पर चाहे कितना भी धन हो, शांति और सुख का अभाव बना रहता है।

जहाँ धर्म, वहाँ महालक्ष्मी

इसके विपरीत, जहाँ सत्य, दया, नम्रता और दानशीलता का वास होता है, वहाँ महालक्ष्मी स्वयं विराजमान होती हैं।
पद्म पुराण में कहा गया है — “धर्म और शुद्धता लक्ष्मी का आसन हैं।” अर्थात्, समृद्धि और स्थिरता केवल वहीं रहती है जहाँ कर्म और विचार दोनों पवित्र हों।

इसलिए जिन घरों में स्वच्छता, श्रद्धा, सत्य और संतोष का वातावरण हो, वहाँ धन और सौभाग्य टिके रहते हैं। यही कारण है कि “लक्ष्मी पूजन” केवल भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन के शुद्धीकरण का प्रतीक है।

वैदिक दृष्टि में धन और धर्म का सम्बन्ध

लक्ष्मी तंत्र के अनुसार, जब धन अधर्म के मार्ग से प्राप्त होता है — अर्थात् छल, अन्याय या लोभ से — तो वह स्थायी नहीं रहता। ऐसे धन से सुख की बजाय संघर्ष जन्म लेता है, क्योंकि वहाँ निष्कलंकता का भाव नहीं होता।
वहीं, धर्ममूलक धन सदा शुभ फल देता है — वह बढ़ता है, दूसरों के काम आता है और आत्मिक शांति लाता है। यह ही “सत्य लक्ष्मी” का स्वरूप है।

“अलक्ष्मी” को दूर रखने के उपाय

वैदिक परंपरा कहती है कि जब हम अपने जीवन में स्वच्छता, संतोष, संयम और करुणा अपनाते हैं, तो धीरे-धीरे अलक्ष्मी स्वयं हट जाती हैं।
दीपदान, कृतज्ञता, और दान — ये तीन कार्य माँ लक्ष्मी को प्रिय हैं। ये केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस ऊर्जा को आमंत्रित करने के माध्यम हैं जो घर और मन दोनों को प्रकाशित करती है।


निष्कर्ष: लक्ष्मी और अलक्ष्मी का भेद हमें एक स्पष्ट संदेश देता है — समृद्धि का आरंभ पवित्रता से होता है। केवल धन नहीं, बल्कि उसका धर्म के साथ चलना ही सच्ची “लक्ष्मी प्राप्ति” है।

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