क्या आपने कभी सोचा है कि माँ लक्ष्मी — धन, सौभाग्य और समृद्धि की देवी — कहाँ से आईं? वेदों और पुराणों के अनुसार, उनका जन्म किसी देवता या मानव से नहीं, बल्कि स्वयं क्षीर सागर (दूध के समुद्र) से हुआ था। यह कथा हमें विष्णु पुराण, भागवत पुराण और महाभारत (आदिपर्व) में विस्तार से मिलती है।
देवताओं की दुर्बलता और समुद्र मंथन का निर्णय
एक समय की बात है, जब देवता अपनी शक्तियाँ खो चुके थे। असुरों के अत्याचार से वे थककर ब्रह्मा और फिर भगवान विष्णु के पास पहुँचे। विष्णु ने समाधान बताया — “तुम असुरों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करो। उस मंथन से दिव्य अमृत निकलेगा, जो तुम्हें अमरत्व लौटाएगा।”
इस प्रकार अमरता और ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए देवताओं और दानवों ने पहली बार साथ मिलकर कार्य किया — इसे ही कहा गया समुद्र मंथन।
मंथन की शुरुआत और रत्नों का प्रकट होना
क्षीर सागर में मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। जब मंथन शुरू हुआ, तो निकलने लगे अद्भुत रत्न —
पहले हलाहल विष निकला, जिसे शिव ने अपने कंठ में धारण किया। उसके बाद क्रमशः कामधेनु, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा अश्व, पारिजात वृक्ष, अप्सराएँ, चंद्रमा, और अन्य दिव्य संपदाएँ प्रकट हुईं।
जब मंथन अपनी ऊँचाई पर पहुँचा, तब महासागर से प्रकट हुईं एक दिव्य तेजस्विनी स्त्री — स्वर्ण के समान आभा, कमल समान मुख मंडल, और अंतहीन करुणा लिए हुए।
श्री या महालक्ष्मी का अवतरण
वेदों में उन्हें “श्री” कहा गया है, और पुराणों में “लक्ष्मी”। वे पूर्ण तेज और सौंदर्य की मूर्ति थीं। उनके हाथों में कमल था, और जहाँ-जहाँ वे चलीं, वहाँ सौभाग्य और समृद्धि प्रकट होती गई। कमल से उत्पन्न होने के कारण उन्हें “कमलजा” और “पद्मा” भी कहा गया।
विष्णु पुराण कहता है कि जब वे देवताओं के बीच आईं, तो सभी देवताओं ने उन्हें अपने गुणों के प्रतीक उपहार भेंट किए — सूर्य ने अपनी आभा, इंद्र ने अपना सिंहासन, और वरुण ने मोती। अंततः लक्ष्मी स्वयं नारायण के वामभाग में स्थिर होकर श्रीविष्णु के अर्धांगिनी बनीं।
सृष्टि में लक्ष्मी का प्रतीक अर्थ
उनके और विष्णु के इस दिव्य संयोग से यह सिद्ध हुआ कि लक्ष्मी बिना विष्णु (पालनकर्त्ता) के स्थायी नहीं। अर्थात्, धन और वैभव तभी टिकता है जब वह धर्म और संतुलन के साथ जुड़ा हो। यही कारण है कि लक्ष्मी की कृपा के साथ हमेशा विष्णु का आशीष माना जाता है।
वैदिक दृष्टि से “श्री” का अर्थ
ऋग्वैदिक श्रीसूक्त में माता श्री का वर्णन इस प्रकार किया गया है— उन्हें विश्व की पोषक, समृद्धि की मूल शक्ति और सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। वह केवल भौतिक संपत्ति की देवी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्कर्ष की भी साक्षात् ऊर्जा हैं।
निष्कर्ष: समुद्र मंथन की यह कथा हमें यह सिखाती है कि समृद्धि का उदय तभी होता है जब संघर्ष, समर्पण और सामूहिक प्रयास का संतुलन हो। माँ लक्ष्मी, जो समुद्र से जन्मी थीं, केवल धन की नहीं बल्कि सृष्टि के संतुलन की प्रतीक हैं।